अनंत व्रत मनाई, 14 गांठों की डोर बांह पर बांधी
शुक्रवार को अनंत चतुर्दशी मनाई गई । इसके साथ ही गणेश जी की विदाई हुई। साथ ही भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप का पूजन और व्रत रखा गया। इस पूजा में एक विशेष डोरी (अनंत) का बड़ा महत्व है। इसमें 14 धागे और उनमें 14 गांठें लगाई जाती हैं। जो भगवान विष्णु के 14 अवतारों का प्रतीक हैं। इन गांठों पर उनके विभिन्न नामों का उच्चारण करते हुए अनंत को बांह पर पहना जाता है। ये धागे दो रंग के होते हैं। एक पीला, दूसरा लाल। पीला पुरुष और लाल महिलाएं अपनी बांह पर बांधती हैं। ज्योतिषी राममोहन शर्मा ने बताया कि शास्त्रों में भगवान विष्णु के 14 नामों अनंत पुरुषोत्तम ऋषिकेश पद्मनाभ माधव बैकुंठ श्रीधर मधुसूदन वामन त्रिविक्रम केशव नारायण दामोदर गोविंद का संबंध 14 लोकों से भी है। इस दिन सुख, शांति, धन और समृद्धि की कामना के लिए भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और नारायण रूप (ॐ नमो नारायणाय) की आराधना लाभकारी मानी गई है। अनंत चतुर्दशी के पूजा की शुरुआत पांडवों ने की थी। मान्यताओं के अनुसार पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर दुखों से मुक्ति और सुख, समृद्धि की प्राप्ति के लिए अनंत व्रत रखकर अनंत की पूजा की और अनंत डोरा को बांह पर धारण किया। इसके बाद कौंडिल्य और उनकी पत्नियों दीक्षा और शीला ने भी अनंत की पूजा की। तब से ही हिंदू धर्म में अनंत पूजा का प्रचलन चला आ रहा है। यह व्रत हर वर्ष भादौ मास के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को किया जाता है। शरीर में ऊर्जा का संतुलन बनाने में मददगार: 14 गांठें शरीर के 14 बिंदुओं जैसे, कलाई, कंधे अन्य जोड़ों का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्राकृतिक चिकित्सक डॉ. वीरेंद्र अग्रवाल ने बताया कि शरीर में ऊर्जा का संतुलन बनाने में मदद करती हैं। एकाग्रता बढ़ती है, मानसिक शांति, स्थिरता प्राप्त होती है। हर गांठ का अपना महत्व है।
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