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धर्मPitru Paksha में नए कपड़े और सामान की खरीदारी अशुभ क्यों, धार्मिक परंपरा और मान्यताओं के नियम
सनातन धर्म में पितृ पक्ष का बेहद महत्वपूर्ण और अत्यंत पवित्र माना जाता है। आज यानी 26 सितंबर 2026 से भाद्रपद पूर्णिमा से पितृपक्ष की शुरुआत हो गई है और इसका समापन आश्विन मास की अमावस्या पर होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन 16 दिनों में पूर्वज अपने परिवार से मिलने धरती पर आते हैं। पितृ पक्ष का यह समय हमारे दिवंगत पूर्वजों को समर्पित है। इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति और उनका आशीर्वाद पाने के लिए श्रद्धापूर्वक श्राद्ध, तर्पण और दान, पुण्य करते हैं। जैसा है कि जब पितृ पक्ष की शुरुआत होती है, हर किसी के मन में सवाल आता है कि इस दौरान नए कपड़े या अन्य नई चीजों को खरीदनी चाहिए? आइए आपको बताते हैं धार्मिक शास्त्र क्या कहता है। यह समय दिखावे से दूर रहना धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, पितृ पक्ष में नए कपड़े या कोई भी नई चीज खरीदना शुभ नहीं होता है, इसे वर्जित माना जाता है। दरअसल, यह समय खुशी मनाने का नहीं है। नई चीजें या चमकीले कपड़े हमारे मन में दिखावे की भावना पैदा करते हैं। इन 16 दिनों का समय पूरी तरह से आध्यात्मिक शांति, सादगी और पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए होता है। सादगी और हल्के रंगों का महत्व, धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, श्राद्ध के दौरान सादे और सात्विक कपड़े पहनना ही सबसे अच्छा माना जाता है।, पूजा, पाठ और तर्पण के समय सफेद, हल्का पीला और अन्य हल्के रंग के कपड़े पहनना शुभ होता है।, असल में हल्के रंग मन को शांत करता है और पवित्रता का अहसास दिलाता है।, सादे कपड़े में रहकर जब आप श्राद्ध करते हैं, तो मन में कोई अंहकार नहीं आता है और पूरा ध्यान पितरों की सेवा पर ही रहता है। पारिवारिक पंरपरा और अपवाद धार्मिक मान्यता के अनुसार, यदि आपके परिवार, गांव या समाज में सालों से यह परंपरा चली आ रही है कि पितृ पक्ष में कुछ नया खरीदा जाता है या फिर पहना जाता है, तो आप अपनी उस पारिवारिक परंपरा को निभा सकते हैं। धर्म किसी भी किसी नियम को थोपता नहीं है कि बल्कि व्यक्तिगत मान्यताओं मान्यताओं का सम्मान करता है। वैसे हर क्षेत्र और परिवार की परंपराएं अलग हो सकती हैं। आप इसका पालन कर सकते हैं। आपको परिवार में जो परंपरा निभाई जा रही है, उसका पालन करें।

Pitru Paksha में Purnima Shraddh पर तर्पण और Panchabali की पूरी विधि
हिंदू धर्म में पितृपक्ष में पूर्वजों को याद किया जाता है और उनके प्रति श्रद्धा अर्पित की जाती है। इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मिक शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे धार्मिक काम करते हैं। इस बार 26 सितंबर 2026, शनिवार को भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध किया जाएगा। वहीं इसके अगले दिन यानी की 27 सितंबर को आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि शुरू होगी। इस तिथि से मुख्य रूप से पितृपक्ष की शुरूआत मानी जाती है। पूर्णिमा श्राद्ध आज यानी की 26 सितंबर 2026 को पूर्णिमा श्राद्ध है, इस दिन उन पूर्वजों का याद किया जाता है और श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि को होती है। अगर घर, परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई थी, तो पितृपक्ष में पूर्णिमा श्राद्ध की तिथि पर श्राद्ध किया जाता है। मुख्य पितृपक्ष से पहले आने वाली पूर्णिमा श्राद्ध को महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है। पूर्णिमा श्राद्ध और प्रतिपदा श्राद्ध में फर्क पूर्णिमा श्राद्ध और प्रतिपदा श्राद्ध के बीच मुख्य अंतर तिथि का है। 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध उन पूर्वजों का किया जाता है, जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई थी। वहीं 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध में उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को हुई थी। जानें पूर्णिमा श्राद्ध की विधि इस दिन सुबह उठकर स्नान करें और फिर साफ सफेद कपड़े पहनें। इसके बाद रौहिणी या कुतुप मुहूर्त में दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठें। अब दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में कुश की पवित्री पहनें। अब तांबे या कांसे के बर्तन में कच्चा दूध, शुद्ध जल, काले तिल, सफेद फूल और अक्षत मिलाएं। दोनों हाथों में कुश रखें और जल लेकर 'ॐ पितृभ्यः नमः' बोलते हुए अपने गोत्र का नाम लें। फिर अंगूठे के सहारे से जल को किसी बर्तन में गिराएं। तर्पण के बाद प्याज, लहसुन के बिना बनाए गए खाने को छोटे, छोटे हिस्सों में कुत्ते, कौवे, गाय, चींटी और देवता के लिए अलग, अलग रखें। इसको पंचबलि भी कहा जाता है। वहीं संभव हो तो ब्राह्मणों को भोजन कराएं और यथासंभव दान दें। वहीं मंदिर या जरूरतमंद को आटा, चावल, सब्जी और फल आदि का दान दें। वहीं श्राद्ध कर्म के अंत में अगस्त्य ऋषि सहित अपने पूर्वजों से प्रार्थना करें और भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।

बिलासपुर हिंसा केस में पुलिस की बड़ी सफलता, मुख्य आरोपी दोस्त के घर से गिरफ्तार
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)। बिलासपुर में हुई हिंसा के मुख्य आरोपी ठाकुर राम सिंह को स्थानीय पुलिस ने मध्य प्रदेश के पन्ना जिले से गिरफ्तार कर लिया है। आरोपी माकरी गांव में...

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Pitru Paksha 2026: पितृपक्ष में बाल, दाढ़ी और नाखून काटने को लेकर क्या है मान्यता? जानें नियम
पितृपक्ष में बाल, दाढ़ी और नाखून काटने से बचने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार यह समय पूर्वजों के स्मरण, श्राद्ध और संयम के लिए समर्पित होता है।
नाग दमन से महारास तक गूंजा जयघोष
पुंदाग स्थित श्री राधा, कृष्ण प्रणामी मंदिर में श्री राधाष्टमी महोत्सव के तहत चल रहे सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के छठे दिन भारी बारिश के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे.
प्रेत योनि में भटकने वालों को यहां मिलती है मुक्ति: स्कंद पुराण में नारायणी शिला का खास महत्व, श्राद्ध के लिए विदेश से पहुंचते हैं लोग – Haridwar News
आज से श्राद्ध पक्ष शुरू हो रहा है। इसके साथ ही धर्मनगरी हरिद्वार में गंगा घाटों से लेकर नारायणी शिला तक पितरों के निमित्त होने वाले कर्मकांड शुरू हो जाएंगे। देश, दुनिया के अलग, अलग हिस्सों में रहने वाले लोग अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करने, तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म के लिए हरिद्वार पहुंचते हैं। खासतौर […]

पितृपक्ष पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता प्रकट करने का पर्व: संजय सर्राफ
विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिंदू धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण का अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर माना गया है। यह अवधि हमें उन पितरों का स्मरण करने का संदेश देती है, जिनके संस्कार, त्याग और आशीर्वाद से परिवार और समाज की परंपराएं आगे बढ़ती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण, भोजन तथा दान, पुण्य करने से पितरों की तृप्ति और शांति की कामना की जाती है। इस वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध 26 सितंबर को होगा। इसके अगले दिन, 27 सितंबर से पितृपक्ष के प्रमुख श्राद्ध आरंभ होंगे। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। उन्होंने कहा कि पितृपक्ष का मूल उद्देश्य दिवंगत पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करना है। यह उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी अवसर है। उन्होंने कहा कि पितृपक्ष केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह परिवार की जड़ों, संस्कारों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का पर्व भी है। यह नई पीढ़ी को अपने परिवार के इतिहास और परंपराओं से जोड़ने का अवसर देता है। इस अवधि में जरूरतमंदों को भोजन कराना, वस्त्र तथा अन्न का दान करना, सेवा कार्य करना पुण्यकारी माना जाता है। श्रद्धा, सेवा, दान और सदाचार के साथ मनाया गया यह पर्व परिवार में संस्कार, एकता और कृतज्ञता की भावना को मजबूत करता है।

Pitru Paksha 2026: पितृ पक्ष आज से शुरू, तर्पण में इन चीजों का करें इस्तेमाल; जानें कुश का महत्व
Pitru Paksha 2026: 26 सितंबर से पितृ पक्ष शुरू हो रहा है। जानें तर्पण की जरूरी सामग्री, कुश का महत्व और तर्पण करते समय किन नियमों का ध्यान रखें।
शांति हवन के साथ दस लक्षण महापर्व संपन्न
लुधियाना| श्री दिगंबर जैन मंदिर, दुगरी में आयोजित दस लक्षण महापर्व का समापन उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना के साथ किया गया। दस दिन चले इस आयोजन के अंतिम दिन मंदिर परिसर में शांति हवन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया और सुख, शांति तथा मंगल की कामना की। हवन के बाद मंदिर से भव्य रथ यात्रा निकाली गई। श्रद्धालु भगवान के जयकारों और धार्मिक भजनों के साथ रथ यात्रा में शामिल हुए। इस अवसर पर पं. अभय जैन शास्त्री ने उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दस लक्षण महापर्व आत्मचिंतन, संयम, त्याग और आत्मशुद्धि का पर्व है। मंदिर में प्रतिदिन पूजन, अभिषेक, शांतिधारा, धार्मिक प्रवचन और अन्य कार्यक्रम आयोजित किए गए। समापन पर श्रद्धालुओं ने आयोजन में सहयोग करने वालों के प्रति आभार व्यक्त किया।

अनंत व्रत मनाई, 14 गांठों की डोर बांह पर बांधी
शुक्रवार को अनंत चतुर्दशी मनाई गई । इसके साथ ही गणेश जी की विदाई हुई। साथ ही भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप का पूजन और व्रत रखा गया। इस पूजा में एक विशेष डोरी (अनंत) का बड़ा महत्व है। इसमें 14 धागे और उनमें 14 गांठें लगाई जाती हैं। जो भगवान विष्णु के 14 अवतारों का प्रतीक हैं। इन गांठों पर उनके विभिन्न नामों का उच्चारण करते हुए अनंत को बांह पर पहना जाता है। ये धागे दो रंग के होते हैं। एक पीला, दूसरा लाल। पीला पुरुष और लाल महिलाएं अपनी बांह पर बांधती हैं। ज्योतिषी राममोहन शर्मा ने बताया कि शास्त्रों में भगवान विष्णु के 14 नामों अनंत पुरुषोत्तम ऋषिकेश पद्मनाभ माधव बैकुंठ श्रीधर मधुसूदन वामन त्रिविक्रम केशव नारायण दामोदर गोविंद का संबंध 14 लोकों से भी है। इस दिन सुख, शांति, धन और समृद्धि की कामना के लिए भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और नारायण रूप (ॐ नमो नारायणाय) की आराधना लाभकारी मानी गई है। अनंत चतुर्दशी के पूजा की शुरुआत पांडवों ने की थी। मान्यताओं के अनुसार पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर दुखों से मुक्ति और सुख, समृद्धि की प्राप्ति के लिए अनंत व्रत रखकर अनंत की पूजा की और अनंत डोरा को बांह पर धारण किया। इसके बाद कौंडिल्य और उनकी पत्नियों दीक्षा और शीला ने भी अनंत की पूजा की। तब से ही हिंदू धर्म में अनंत पूजा का प्रचलन चला आ रहा है। यह व्रत हर वर्ष भादौ मास के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को किया जाता है। शरीर में ऊर्जा का संतुलन बनाने में मददगार: 14 गांठें शरीर के 14 बिंदुओं जैसे, कलाई, कंधे अन्य जोड़ों का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्राकृतिक चिकित्सक डॉ. वीरेंद्र अग्रवाल ने बताया कि शरीर में ऊर्जा का संतुलन बनाने में मदद करती हैं। एकाग्रता बढ़ती है, मानसिक शांति, स्थिरता प्राप्त होती है। हर गांठ का अपना महत्व है।

सुंदरवन की वो देवी, जिनके आगे हिंदू, मुसलमान दोनों झुकाते हैं सिर, जानिए वनबीबी की अनोखी कहानी
सुंदरवन में वनबीबी को जंगलों की संरक्षक देवी माना जाता है। खास बात है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग वनबीबी में आस्था रखते हैं। जानिए इस अनोखी लोक परंपरा की पूरी कहानी।

मोक्ष कल्याणक की स्मृति में चढ़ाया गया निर्वाण लाड़ू
भास्कर न्यूज | बलौदा बाजार जैन समाज में दस दिवसीय पर्यूषण पर्व का समापन अनंत चतुर्दशी के अवसर पर श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ हुआ। इस मौके पर श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में सुबह से ही धार्मिक अनुष्ठानों का दौर चला। समाज के लोगों ने भगवान जिनेंद्र का अभिषेक, शांतिधारा और विशेष पूजा, अर्चना की। इसके बाद भगवान के मोक्ष कल्याणक की स्मृति में निर्वाण लाड़ू अर्पित किया गया। मंदिर परिसर में दिनभर धार्मिक वातावरण बना रहा। पर्यूषण पर्व जैन समाज के प्रमुख आध्यात्मिक पर्वों में शामिल है। दस दिनों के दौरान श्रद्धालु आत्मचिंतन, संयम, तप और त्याग के माध्यम से आत्मशुद्धि का प्रयास करते हैं। पर्व के प्रत्येक दिन जैन धर्म के दस धर्मों की आराधना की गई। इनमें उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य शामिल हैं। अनंत चतुर्दशी पर विशेष पूजा के साथ पर्व का समापन हुआ। मूलनायक भगवान की शांतिधारा का मिला सौभाग्य: अनंत चतुर्दशी के अवसर पर मूलनायक भगवान की शांतिधारा का सौभाग्य स्वर्गीय नेमीचंद की स्मृति में दिनेश छाबड़ा, निश्चल छाबड़ा और कुमारी प्रीशा को प्राप्त हुआ। वहीं प्रतिदिन होने वाली शांतिधारा का सौभाग्य नीरज कुमार छाबड़ा, धीरज कुमार, धवल दक्ष और समस्त छाबड़ा परिवार को मिला। विशेष पूजा के दौरान भगवान को कलश अर्पित करने का सौभाग्य प्रवीण आदि छाबड़ा, संजय पाटनी, सुजल काला, तुषार पाटनी, संजय सोनाडी वाले, मनोज पाटनी, नीरज छाबड़ा, सुभाष छाबड़ा, मयूर छाबड़ा, शैलेश छाबड़ा, दिव्यांश जैन और श्रेयांस पाटनी को मिला। अनंत चतुर्दशी पर भगवान की निर्वाण आराधना के तहत निर्वाण लाड़ू की बोली रखी गई। इसमें रमेश कुमार, रितेश कुमार और शम्यक कुमार छाबड़ा परिवार को निर्वाण लाडू अर्पित करने का सौभाग्य मिला। श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ भगवान को लाडू अर्पित कर मोक्ष कल्याणक का स्मरण किया। दस दिनों तक चले पर्यूषण पर्व के दौरान जैन समाज के लोगों ने पूजा, अर्चना के साथ संयम, अहिंसा, त्याग और आत्मचिंतन को जीवन में उतारने का संकल्प लिया। अनंत चतुर्दशी के साथ पर्व का धार्मिक समापन हुआ।

Anant Chaturdashi 2026: अनंत सूत्र बांधते समय न करें ये गलतियां, जानें पुरुषों और शादीशुदा महिलाओं के लिए नियम
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