
Photo: Regional Meteorological Center, New Delhi (India Meteorological Department)
मौसम और बारिश का बदलता मिजाज: सुपर अल नीनो, 'क्लाइमेटफ्लेशन' और तकनीक की नई जंग
13 जुलाई, 2026: दुनिया भर के मौसम विज्ञानी और नीति निर्माता इस समय कुदरत के एक बेहद उलझे हुए चक्र से जूझ रहे हैं। प्रशांत महासागर की सतह पर अंगारे की तरह सुलगते ‘सुपर अल नीनो’, अनियंत्रित मॉनसून और तबाही मचाते चक्रवातों ने वैश्विक कृषि और अर्थव्यवस्था के माठे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। आज जारी हुई ताज़ा रिपोर्टें साफ़ इशारा कर रही हैं कि मौसम के इन कड़े तेवरों ने न केवल जनजीवन को अस्त व्यस्त किया है, बल्कि दुनिया की थाली पर भी संकट खड़ा कर दिया है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में weather, rains की बढ़ती अनिश्चितता आज हमारी सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है।
अल नीनो का वैश्विक प्रकोप: 'क्लाइमेटफ्लेशन' और खाद्य असुरक्षा का गहराता संकट
मौसम के इस बदलते और आक्रामक रुख के पीछे सबसे बड़ा विलेन प्रशांत महासागर में सक्रिय हुआ 'सुपर' अल नीनो चक्र है। विज्ञानियों का अनुमान है कि इस बात की 63 फीसदी आशंका है कि प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस ऊपर निकल जाएगा। इस थर्मल असंतुलन ने अर्थशास्त्रियों की रातों की नींद उड़ा दी है, जिन्होंने अब 'क्लाइमेटफ्लेशन' (जलवायु जनित महंगाई) को लेकर देश दुनिया को आगाह किया है।
असमय और बेतरतीब ढंग से होने वाली weather, rains ने गेहूं, धान और गन्ने जैसी मुख्य फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। भारत समेत पूरे एशिया और अफ्रीका में कहीं सूखा तो कहीं अतिवृष्टि के कारण खरीफ फसलों की बुवाई पिछड़ गई है। जानकारों का कहना है कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो आने वाले महीनों में खाने पीने की चीजों के दाम आसमान छूने लगेंगे।
इसी बीच, इंटरनेशनल रेस्क्यू कमेटी (IRC) की एक डराने वाली रिपोर्ट सामने आई है। इसके मुताबिक, पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण एशिया के कई देश इस समय बाढ़, भूस्खलन और हैजा जैसी महामारियों की कगार पर खड़े हैं। केन्या, सोमालिया, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे मुल्कों में हालात बेहद नाजुक हैं। दक्षिणी सोमालिया में सामान्य से अधिक बारिश की 60% आशंका है, जिससे बाढ़ के साथ साथ पीने का पानी दूषित होने का खतरा बढ़ गया है। वहीं, केन्या में साल 2026 के अंत तक अल नीनो का असर बने रहने की आशंका 80 से 82 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो एक बड़े मानवीय संकट का खुला बुलावा है।
एशिया से अमेरिका तक मौसम का तांडव: टाइफून बावी की तबाही और भारतीय मानसून का 'ब्रेक'
एक तरफ जहाँ दुनिया का एक बड़ा हिस्सा सूखे की मार झेल रहा है, वहीं दूसरी ओर विनाशकारी तूफानों का कहर जारी है। साल 2026 में चीनी सरज़मीन से टकराने वाला सबसे भयानक चक्रवात 'टाइफून बावी' (Typhoon Bavi) पूर्वी प्रांत झेजियांग में तबाही मचाने के बाद उत्तर की ओर बढ़ गया है। इसके चलते लियाओनिंग, हेबेई, जिलिन और जियांगसू जैसे प्रांतों में बाढ़ का रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है।
लियाओनिंग की राजधानी शेनयांग में हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि वहां बाढ़ नियंत्रण तंत्र को उच्चतम स्तर पर सक्रिय करना पड़ा है। स्कूल, दफ्तर और बाजार बंद हैं, रेल पटरियां पानी में डूब चुकी हैं और अब तक पौने दो लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। हेबेई प्रांत की सड़कों पर दो मीटर से ज्यादा पानी बह रहा है, जिससे गाड़ियां खिलौनों की तरह तैरती नजर आ रही हैं। इससे पहले दक्षिणी चीन के गुआंगशी प्रांत में आई बाढ़ ने 39 लोगों की जान ले ली थी। ये आंकड़े साफ करते हैं कि इस साल weather, rains का मिजाज कितना हिंसक हो चुका है।
इधर भारत में मानसून का रुख थोड़ा हैरान करने वाला है। शुरुआती दौर की झमाझम बारिश के बाद, दक्षिण पश्चिम मानसून अचानक उत्तर पश्चिम, मध्य और दक्षिणी भारत में सुस्त पड़ गया है। मौसम विज्ञानियों की भाषा में इसे 'मानसून ब्रेक' कहा जाता है, जो अगले एक हफ्ते तक खिंच सकता है। खेती किसानी के लिहाज से यह बेहद नाजुक समय है, और इस दौरान खेतों को पानी न मिलना फसलों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।
12 जुलाई, 2026 तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश भर में कुल 219.4 मिमी बारिश दर्ज की गई है, जो सामान्य औसत (266.9 मिमी) से लगभग 18% कम है। सबसे बुरा हाल पूर्वी और उत्तर पूर्वी भारत का है, जहां सामान्य से 37% कम पानी बरसा है। हालांकि, देश के कुछ चुनिंदा हिस्सों में स्थानीय मौसमी गड़बड़ी के कारण भारी वर्षा भी देखी गई है:
- असम और मेघालय के पहाड़ी और तराई क्षेत्रों में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश ने ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के जलस्तर को खतरे के निशान से ऊपर पहुंचा दिया है, जिससे मैदानी इलाकों में बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है।
- पश्चिमी घाट और तटीय कर्नाटक में भी रुक रुक कर भारी बौछारें पड़ रही हैं, जिससे स्थानीय यातायात बाधित हुआ है, जबकि मध्य भारत के मैदानी इलाके अब भी बूंद बूंद को तरस रहे हैं।
आधुनिक तकनीक और पूर्व चेतावनी प्रणालियां: जलवायु संकट से निपटने का नया हथियार
इस गहराते संकट के बीच, विज्ञान और तकनीक ही मानवता के लिए सबसे बड़ी उम्मीद बनकर उभरे हैं। आज मौसम विज्ञान का ढांचा केवल पारंपरिक थर्मामीटर या बैरोमीटर तक सीमित नहीं है, बल्कि सुपर कंप्यूटर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और आधुनिक उपग्रहों के दम पर मौसम का सटीक आकलन किया जा रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी (NOAA) के अत्याधुनिक मौसम उपग्रह पल पल की तस्वीरें और वायुमंडलीय दबाव के आंकड़े साझा कर रहे हैं। इन आंकड़ों की मदद से वैज्ञानिक अब चक्रवातों और बादलों के फटने जैसी घटनाओं का पूर्वानुमान कई दिन पहले ही लगा लेते हैं।
पूर्वानुमान की इस नई तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि समय रहते तटीय और संवेदनशील इलाकों से लोगों को सुरक्षित निकाला जा पा रहा है। 'अर्ली वार्निंग सिस्टम' (पूर्व चेतावनी प्रणाली) के जरिए अब मछुआरों और किसानों के मोबाइल पर सीधे अलर्ट भेजे जा रहे हैं। इससे न केवल जानमाल का नुकसान कम हुआ है
